संपादकीय

डायबिटीज के लिए कितनी कारगर आयुर्वेदिक थ्योरी? साइड इफेक्ट बिना इलाज का दावा, जानें एक्सपर्ट्स की राय

डायबिटीज आज भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में तेजी से फैलने वाली जीवनशैली से जुड़ी गंभीर बीमारी बन चुकी है. ऐसे में पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों, खासकर आयुर्वेद को लेकर लोगों की रुचि लगातार बढ़ रही है. प्राकृतिक इलाज और जड़ से बीमारी खत्म करने जैसे दावे तो आम हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या आयुर्वेद वास्तव में डायबिटीज का इलाज कर सकता है? इस विषय पर भारत सरकार, आयुष मंत्रालय और विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा किए गए अध्ययन क्या कहते हैं, आइये जानते हैं…

आयुर्वेद ने पिछले कुछ सालों में काफी तेजी से स्वास्थ्य क्षेत्र में अपने प्रभाव को स्थापित करने की कोशिश की है. खासतौर पर उत्तराखंड तो इस मामले में जनक की भूमिका के रूप में देखा जाता रहा है. निजी कोशिशों से आगे बढ़कर अब सरकारी स्तर पर भी आयुर्वेद को आगे बढ़ाया जा रहा है.

ऐसी स्थिति में जब तमाम बीमारियों के लिए आयुर्वेद की तरफ नजरें बनी हुई है, तब देश में सबसे तेजी से बढ़ रहे डायबिटीज के लिए भी आयुर्वेद चिकित्सा से उम्मीद की जा रही है. भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में आयुर्वेद, योग और अन्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं. खास तौर पर डायबिटीज, हृदय रोग और कैंसर जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के इलाज में आयुष पद्धति को शामिल करने की कोशिश की जा रही है.

सरकार के एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में गैर-संचारी रोगों (Non-Communicable Diseases) के नियंत्रण के लिए आयुष और आधुनिक चिकित्सा को साथ जोड़ने की पहल की गई. इस पायलट प्रोजेक्ट के तहत मरीजों को आयुर्वेदिक दवाओं, योग और आहार सुधार के जरिए इलाज दिया गया. कई सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर यह प्रयोग लागू किया गया. जहां मरीजों के डेटा के आधार पर परिणामों का मूल्यांकन किया गया.
इसके अलावा सरकार आयुष अस्पतालों को रिसर्च केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में भी काम कर रही है. उद्देश्य यह है कि पारंपरिक चिकित्सा को वैज्ञानिक आधार पर परखा जाए. प्रमाण आधारित उपचार पद्धति विकसित की जा सके. डायबिटीज पर आयुर्वेद के प्रभाव को लेकर कई शोध किए गए हैं. एक व्यापक समीक्षा में दर्जनों रिसर्च पेपर और क्लिनिकल ट्रायल का विश्लेषण किया गया. इनमें आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों, खानपान में बदलाव और जीवनशैली सुधार के प्रभावों को देखा गया.
कई अध्ययनों में यह पाया गया कि कुछ आयुर्वेदिक औषधियां जैसे गुड़मार, करेला, मेथी आदि ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में सहायक हो सकती हैं. इनका असर शरीर के मेटाबॉलिज्म और इंसुलिन सेंसिटिविटी पर देखा गया है. हालांकि, ये अध्ययन अलग-अलग पद्धतियों और सीमित सैंपल साइज पर आधारित थे. जिससे इनके परिणामों को सार्वभौमिक रूप से लागू करना मुश्किल है.

इलाज के तौर पर आयुर्वेद में तीन मुख्य चीजों पर जोर दिया जाता है. इसमें औषधि, आहार (डाइट कंट्रोल) विहार (जीवनशैली और दिनचर्या) आयुर्वेदिक उपचार में मरीज को केवल दवा नहीं दी जाती, बल्कि उसकी पूरी जीवनशैली को बदला जाता है. इसमें नियमित व्यायाम, योग, समय पर भोजन और तनाव नियंत्रण शामिल होता है.

हालांकि आयुर्वेद को लेकर सकारात्मक संकेत मिलते हैं, लेकिन इसके साथ कई सीमाएं भी जुड़ी हैं. सबसे बड़ी चुनौती है मजबूत वैज्ञानिक प्रमाणों को तैयार करना है. फिलहाल अधिकांश अध्ययन छोटे स्तर पर ही किए गए हैं. इसके अलावा आयुर्वेदिक दवाओं की गुणवत्ता और मानकीकरण भी एक बड़ी समस्या है. अलग-अलग जगहों पर बनने वाली दवाओं की संरचना में अंतर हो सकता है, जिससे उनके प्रभाव में भी फर्क आता है.

एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बहुत से मरीज आयुर्वेद और एलोपैथी दोनों का एक साथ उपयोग करते हैं, लेकिन वे अपने डॉक्टर को इसकी जानकारी नहीं देते. इससे दवाओं के बीच प्रतिक्रिया (drug interaction) का खतरा बढ़ जाता है, जो कभी-कभी गंभीर हो सकता है.

हालांकि, इस सबके बीच आयुर्वेदिक चिकित्सक भी मानते हैं कि मरीज की डायबिटीज हिस्ट्री देखकर ही दवाएं दी जाती हैं. यदि हिस्ट्री लंबी है और एलोपैथ से इलाज करवाया गया है तो आयुर्वेदिक इलाज के दौरान एलोपैथिक दवाएं भी दी जाती हैं. हालांकि, इलाज करते हुए धीरे धीरे सुधार के साथ एलोपैथिक दवाओं को खत्म करते हुए आयुर्वेदिक दवाओं पर ही इलाज चलाया जाता है.

उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के अस्पताल में काम करने वाले चिकित्सक डॉक्टर जसप्रीत सोढ़ी कहते हैं कि हर दिन करीब 30 से 35 मरीज अस्पताल में ऐसे आते हैं जो डायबिटीज से ग्रसित होते हैं. आयुर्वेदिक दवाओं का उपयोग करने के बाद कई मरीजों का शुगर नॉर्मल हुआ है. आयुर्वेद से जुड़े प्रोफेसर और तमाम चिकित्सक कहते हैं कि आयुर्वेद ब्लड शुगर कंट्रोल करने में मदद कर सकता है. जीवनशैली सुधारने में प्रभावी है. इसके अलावा प्रीडायबिटीज की स्थिति में रोग को बढ़ने से भी ये रोक सकता है.

इन तमाम दावों के बीच ऐसे भी कई मरीज हैं जो मानते हैं कि उन्होंने एलोपैथिक दावों को छोड़कर आयुर्वेद की तरफ जाने का फैसला किया है. इसके लिए बाकायदा वह आयुर्वेद से जुड़ी दवाओं को लेना भी शुरू कर चुके हैं. जिसका असर भी उन्हें महसूस हो रहा है.

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